वो भी क्या दिन थे। बिना रोकटोक के रास्तों पर निकल जाना, वक्तबेवक्त हल्ला मचाना। घिसेपिटे काम मे लगे रहना, न चाहते हुए भी रोज ऑफिस जाना। हर दिन, हफ्ते, महीने पार्टी करने का बहाना ढूंढना। किसीसे दिल जुड़े तो उसे कॉफी शॉप में ले जाना। बिना रोकटोक के रास्तों पर निकल जाना, वक्तबेवक्त हल्ला मचाना। आज खिड़की में बैठे दोस्तों की हँसी कानो में गूंज रही हैं। आंखें दूर दूर तक किसी इंसान को ढूंढ रही हैं। याद आते वो दिन, बिना रोकटोक के रास्तों पर निकल जाना, वक्तबेवक्त हल्ला मचाना। संकट आज सर पे हैं, कुछ दिनों का कर्फ्यू हैं। इस बार हमने साथ नही दिया, तो एक इंसान भी न रहेगा। बचे हुए कुछ इन यादों के साथ जियेंगे। वो भी क्या दिन थे... -Shamitha Heramb